गणेश चतुर्थी : श्रीगणेश का पावन पर्व
गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है, भारत के सबसे लोकप्रिय और भव्य त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है, जिन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है। महाराष्ट्र सहित कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, गोवा, गुजरात और भारत से बाहर भी जहाँ-जहाँ भारतीय समुदाय रहते हैं, वहाँ बड़े हर्षोल्लास से इस त्योहार का आयोजन किया जाता है।

गणेश चतुर्थी का महत्व
गणेश चतुर्थी भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। गणेश जी को हर शुभ कार्य से पहले पूजा जाता है क्योंकि वे विघ्नों को दूर करने वाले देवता माने जाते हैं।
यह पर्व जीवन के सृजन और विसर्जन के चक्र का प्रतीक है। जैसे मूर्तियों का विसर्जन जल में किया जाता है, वैसे ही यह हमें जीवन की अस्थिरता और त्याग का महत्व सिखाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गणेश चतुर्थी का उल्लेख प्राचीन काल से मिलता है। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से इसे व्यापक स्तर पर मनाया जाने लगा। बाद में स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने 19वीं सदी में इसे सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया। उनका उद्देश्य था कि समाज के सभी वर्ग एक साथ आएं और इस पर्व के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को भी गति मिले।
गणेश चतुर्थी कब मनाई जाती है?
यह त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को मनाया जाता है (आमतौर पर अगस्त या सितंबर में)। यह उत्सव प्रायः 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन मूर्तियों का विसर्जन कर पर्व का समापन होता है। गणेश चतुर्थी 2025 में 27 August दिन बुधवार को मनाई जाएगी | वैसे तो चतुर्थी तिथि 26 August को 1:54 PM को शुरू होगी और 27 August को 3:44 PM, तक रहेगी पंचांग के अनुसार |
पूजा और अनुष्ठान
गणेश चतुर्थी का उत्सव अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
1. मूर्ति स्थापना (प्राणप्रतिष्ठा)
गणेश चतुर्थी के दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की सुंदर मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कलाकार महीनों पहले से मिट्टी और अन्य सामग्री से भव्य मूर्तियाँ बनाना शुरू कर देते हैं। प्राणप्रतिष्ठा की विधि मंत्रोच्चार और पूजा-पाठ के साथ की जाती है।
2. भोग और आरती
भक्त प्रतिदिन पूजा-अर्चना करते हैं, दीप और धूप जलाते हैं और आरती गाते हैं। गणेश जी का प्रिय भोजन मोदक विशेष रूप से चढ़ाया जाता है। इसके अलावा लड्डू, करंजी और फल भी अर्पित किए जाते हैं। “गणपति बप्पा मोरया” के जयघोष से वातावरण गूंज उठता है।
3. सांस्कृतिक कार्यक्रम
कई स्थानों पर पंडालों में नाटक, नृत्य, संगीत, भजन-कीर्तन और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह पर्व समाज को जोड़ने और प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर भी प्रदान करता है।
4. विसर्जन (गणेश विसर्जन)
उत्सव का अंतिम दिन सबसे खास होता है। अनंत चतुर्दशी को गणेश मूर्तियों का भव्य जुलूस निकालकर उन्हें नदियों, समुद्र या तालाबों में विसर्जित किया जाता है। भक्त ढोल-नगाड़ों की धुन पर नाचते-गाते “गणपति बप्पा मोरया, पुन्हा वर्षी लवकर या” के नारों के साथ अपने प्रिय देवता को विदा करते हैं।
पर्यावरण अनुकूल गणेश चतुर्थी
आधुनिक समय में प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियों के कारण जल प्रदूषण की समस्या बढ़ी है। इसी कारण अब लोग पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाने लगे हैं, जैसे:
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मिट्टी (शुद्ध क्ले) से बनी मूर्तियाँ।
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प्राकृतिक रंगों का उपयोग।
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कृत्रिम विसर्जन टैंकों की व्यवस्था।
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गणेशोत्सव के दौरान वृक्षारोपण अभियान।
विभिन्न राज्यों में गणेशोत्सव
भारत के अलग-अलग राज्यों में यह पर्व अलग-अलग अंदाज़ में मनाया जाता है।
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महाराष्ट्र: मुंबई, पुणे और नागपुर में विशाल पंडाल और मूर्तियाँ देखने लायक होती हैं। लालबागचा राजा मुंबई का सबसे प्रसिद्ध गणेश पंडाल है।
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गोवा: इसे चवथ कहा जाता है और परिवारिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
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कर्नाटक और तमिलनाडु: इसे पिल्लैयार चतुर्थी कहते हैं और मंदिरों व घरों में विशेष पूजा होती है।
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आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: बड़े-बड़े पंडाल और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
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विदेशों में: अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर और दुबई में भारतीय समुदाय धूमधाम से यह त्योहार मनाते हैं।
सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व
गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक पर्व ही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक है।
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आध्यात्मिक रूप से, यह भक्ति, श्रद्धा और विनम्रता की शिक्षा देता है।
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सामाजिक रूप से, यह समुदाय को जोड़ता है और सामाजिक कार्यों को प्रोत्साहित करता है जैसे रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य शिविर और शिक्षा अभियान।
आधुनिक समय में गणेशोत्सव
आज के समय में गणेश चतुर्थी का रूप थोड़ा बदल गया है। तकनीक के चलते वर्चुअल दर्शन, ऑनलाइन मूर्ति बुकिंग और लाइव आरती प्रसारण आम हो गए हैं। कोविड-19 महामारी के बाद से डिजिटल गणेशोत्सव ने और भी महत्व पा लिया है। लेकिन बदलते समय के बावजूद भगवान गणेश में आस्था और लोगों की एकजुटता आज भी वैसी ही है।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं है बल्कि यह भक्ति, संस्कृति और समाजिक जिम्मेदारी का अद्भुत संगम है। यह हमें जीवन की अस्थिरता का बोध कराता है और साथ ही यह सिखाता है कि समर्पण और भक्ति से हर बाधा दूर की जा सकती है।
गूंजते नारों – “गणपति बप्पा मोरया, अगले वर्ष तू जल्दी आ” – के साथ भक्त अपने प्रिय देवता को विदा करते हैं और अगले वर्ष के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं।
गणेश चतुर्थी वास्तव में एक ऐसा पर्व है जो आस्था, उत्सव और जिम्मेदारी तीनों को साथ लेकर चलता है, और यही कारण है कि यह पूरे भारत और विश्वभर में सबसे प्रिय त्योहारों में से एक है।